कानपुर: मां-बेटी ने पीएम को लिखा खत, इलाज नहीं तो इच्छा मृत्यु की दें अनुमति

कानपुर: मां-बेटी ने पीएम को लिखा खत, इलाज नहीं तो इच्छा मृत्यु की दें अनुमतिमां-बेटी ने पीएम को लिखा खत, इलाज नहीं तो इच्छा मृत्यु की दें अनुमति

कानपुर : लाइलाज रोग से पीड़ित मां-बेटी ने कहीं से सहारा न मिलते देख पीएम को खत लिख दिया। पत्र में कहा कि अगर केन्द्र सरकार इलाज नहीं करा सकती तो इच्छामृत्यु की अनुमति दे दे जिससे लाचार जिंदगी से छुटकारा मिल सके। यशोदा नगर की रहने वाली 22 साल की अनामिका और उसकी मां शशि मिश्रा मस्क्युलर डिस्ट्रॉफी नाम की बीमारी से ग्रसित है। बेटी ने बताया कि 2002 में इसी रोग को देखते हुए पिता की हार्टअटैक से मौत हो गई। इसके बाद रिश्तेदारों से लेकर परिवारवालों ने नाता तोड़ लिया। इस बीमारी के बारे में जानकारी 1995 में उस समय हुई, जब मां को अचानक चलने-फिरने और काम करने में परेशानी होने लगी। डॉक्टर मुकुल शर्मा ने टेस्ट कराने को कहा। रिपोर्ट में यह बीमारी निकली। डॉक्टरों का कहना है कि इसका इंडिया में कोई इलाज नहीं है। बस एक फिजियोथेरेपी सहारा है, जिससे कुछ आराम मिल सकता है। उसी समय डॉक्टर ने मेरे अंदर भी इस बीमारी के होने के संकेत दे दिए थे। साथ ही कहा था कि आगे चलकर मुझे ज्यादा दिक्कत हो सकती है। पिता की मौत के बाद मां की बराबर देखरेख करती रही। तभी 2006 के बाद मेरे अंदर भी बीमारी के लक्षण आने लगे। हाथ-पैर ने काम करना बंद कर दिया। कॉलेज में सीढियां चढ़ाना मुश्किल होने लगा। किसी तरह मैंने बीकॉम किया लेकिन उसके बाद से मैं पूरी तरह से बिस्तर पर आ गई। कई डॉक्टरों से इलाज कराया, लेकिन कुछ असर नहीं हुआ। पिता के देहांत के बाद घर की आर्थिक स्थिति चरमरा गई। अनामिका ने बताया कि आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया। अब हम मां-बेटी की हालत ये है कि बाथरूम तक जाने के लिए सहारा चाहिए, जिसमें पड़ोसी मदद करते हैं और वही खाना बनाकर देते हैं। जिल्लत भरी इस जिंदगी से परेशान होकर अनामिका ने 2014 में पीएम नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर मदद की गुहार लगाई थी। लिखा था कि हमारे लिए इलेक्ट्रॉनिक बेड और व्हील चेयर के साथ नौकरी दी जाये। ताकि हमें दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े। खत का कोई जवाब आता न देख दोबारा खत लिखा जिसमें लिखा गया कि अगर मांग नहीं पूरी कर सकते तो इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी जाय जिससे इस जिंदगी से छुटकारा मिल सके। पीएम से मां बेटी को तो कोई सहारा नहीं मिला पर अगस्त 2016 में तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने सुध ले ली। सीएम ने 5 अगस्त 2016 को विवेकाधीन कोष से 50 हजार रुपए की आर्थिक मदद दी, उसके बाद हमारी कोई सूचना नहीं ली। अनामिका ने बताया कि हमारी आर्थिक स्थिति को देखते हुए डॉक्टर अभिषेक मिश्रा पिछले पांच साल से मुफ्त में इलाज कर रहे हैं। वह दवाई तक का भी पैसा नहीं लेते। न्यूरोलोजिस्ट डॉ. अजय सिंह के मुताबिक, मस्कुलर डिस्ट्रोफी एक तरह की जेनेटिक (आनुवंशिक) डिसीज है, जो मरीज से उसके संतान को हो जाती है। देश में प्रति दो हजार में से किसी एक को यह बीमारी होती है। अगर समय रहते मरीज का सही से इलाज शुरू न हो, तो उसकी मौत होने की संभावना बढ़ जाती हैं। उन्होंने बताया कि मेल चाइल्ड में तो इस बीमारी की पहचान एक उम्र के बाद हो जाती है, लेकिन फीमेल में मैरिज बाद इसके बारे में जानकारी हो पाती है। जब तक फीमेल में इस बीमारी का ट्रीटमेंट शुरू हो पाता है, तब तक बहुत देर हो जाती है।

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