चुनाव हारने के बाद नये राजनीतिक भविष्य की तलाश में लगे सियासी दिग्गज : पढ़े लेख

चुनाव हारने के बाद नये राजनीतिक भविष्य की तलाश में लगे सियासी दिग्गज : पढ़े लेखLatest Hindi Article Bharat Ka Ujala

जिले की सातों विधानसभा सीटों पर बसपा व गठबंधन प्रत्याशियों को करना पड़ा भीतरीघात का सामना

पूर्व केबिनेट मंत्री डा. धर्म सिंह सैनी का निष्कासन बसपा के लिए रहा सबसे ज्यादा घातक

जिले की सियासत का केन्द्र रहे काज़ी रशीद मसूद व स्व. चौधरी यशपाल सिंह घरानों का वर्चस्व समाप्ति पर
सहारनपुर : विधान सभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। हर कोई चुनावी नतीजों को मत्था पच्ची कर रहा कि आखिर यह अप्रत्याशित परिणाम आये कैसे। उत्तर प्रदेश के तमाम गैर भाजपाई दलों के दिग्गज नेता एक ओर चुनाव परिणामों को लेकर मन्थन करने मे लगे हैं तो वहीं दूसरी ओर कई शीर्ष राजनैतिक हस्तियां चुनाव में हारने के बाद अपने सियासी भविष्य को लेकर न केवल चिन्तीत हैं, सियासत में जिन्दा रहने के रास्ते तलाशने में लगें हैं।पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमान्त जनपद सहारनपुर की बात करें, तो यहां राज्य की सत्ता पर पुरे पांच साल काबिज रही समाजवादी पार्टी केवल सदर सीट ही जीत सकी है। सदर सीट पर विधायक संजय गर्ग की जीत को भारतीय जनता पार्टी के विभिषणों ने मजबूत पंख लगाने के काम किए। सहारनपुर सदर सीट को भाजपा की सबसे ज्यादा मजबूत सीट के रूप में देखा जा रहा था। चुनाव के दौरान रात के सन्नाटें मे भाजपा के कई प्रमुख नेता सपा के संजय गर्ग की साईकिल चलाते रहें। उधर बेहट विधान सभा क्षेत्र में भी सपा के प्रमुख पदों पर नामित नामचिन नेता पूर्व एम.एल.सी हाजी मौ. इकबाल के हाथी को दौडाने में मशगुल रहें। यह बात अलग है कि बेहट के रेतीले एंव पथरीले घाड की जमीन पर हाथी नही दौड सका। सियासी गलियारों में चर्चा है कि इस क्षेत्र में सैनी समाज ने भी एकजुट हो कर बसपा द्वारा नकुड विधायक डा.धर्म सिहं सैनी के किये गये अपमान का बदला कांग्रेस के नरेश सैनी को जीता कर ले लिया हैं। हालांकि नरेश सैनी की जीत के पीछे कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद की कडी मेहनत भी मानी जा रही है, परन्तु इस सीट पर सैनी समाज की एकजुटता तथा दलित मतदाओं का बिखराव भी यहां बसपा एंव भाजपा की हार के प्रमुख कारण सामने आ रहें हैं। बसपा का आम समर्थक भी यहां एम.एल.सी महमूद अली के व्यवहार से खफा दिखाई दिया। सहारनपुर देहात विधान सभा क्षेत्र में मसूद अखतर की जीत का श्रेय भी पूर्व विधायक इमरान मसूद को दिया जा रहा है, लेकिन सियासी गलियारो में चर्चा हैं कि अगर इस क्षेत्र से बसपा किसी गैर दलित को प्रत्याशी बनाती तो नतीजा बसपा के पक्ष में होता। इस क्षेत्र में व्यवहार कुशल एंव स्वच्छ छवि के पूर्व विधायक जगपाल सिंह को डा.धर्मसिंह सैनी के निष्कासन एंव पूर्व विधायक महावीर राणा की बगावत भी मंहगी साबित हुई। यह बात अलग है कि अब जगपाल सिंह हार पर बहुत से लोग अफशोस भी जता रहें हैं। हमारे संवाददाता दिनेश मौर्य एंव नईम सागर ने चुनाव के उपरांत जिले की सातों विधानसभा सीटों का जो अध्यन किया उसमें यह साफ है कि सभी सीटों पर पमुख दलों के उम्मीदवारों को अपनों से ज्यादा नुकसान हुआ है। रामपुर मनिहारान सुरक्षीत सीट पर बसपा के प्रत्याशी रविन्द्र मोल्हू को क्षेत्र के गुर्ज्जर एंव सैनी मतदाताओं की बगावत के साथ-साथ पिछले दस सालों में की गई बसपा के बेस वोट की उपेक्षा का भी खामियाजा चुनाव में भुगतना पडा। यह बात अलग है कि वह चुनाव बहुत कम अन्तर से हारे हैं। इसी क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी रहे विश्व दयाल छोटन के लिये पार्टी के कद्दावर नेता एंव प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद भी संजीवनी नही बन सके। यह भी खुद में एक बडा सवाल इस लिए है कि बेहट तथा साहरनपुर में मिली कांग्रेस प्रत्याशियों की जीत का सेहरा उनके समर्थक इमरान मसूद के सिर पर बांधने में लगे हैं। सूत्रों की मानें तों इस क्षेत्र में कांग्रेस एंव सपा के कई पमुख नेता आखिर तक भाजपा व बसपा के लिए काम करते रहे। इसका प्रमाण है यहां पर कांग्रेस का तीसरे नम्बर पर रहना। गंगोह विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के विधायक प्रदीप चौधरी की जीत के पीछे, गठबन्धन के बाद भी सपा के चौ. रूद्रसैन एंव कांग्रेस के नोमान मसूद द्वारा चुनाव में ताल ठोकना हैं। इसके साथ-साथ जिस प्रकार से पूर्व विधायक इमरान मसूद ने कांग्रेस का विधायक रहते साफ स्वच्छ छवि प्रदीप चौधरी को हासिये पर रखा, उसका लाभ सहानुभूति के रूप में प्रदीप चौधरी को भारतीय जनता पार्टी में जाने के बाद मिला है और वह इमरान मसूद के गढ में ही उनके भाई नोमान मसूद को पछाड कर विधायक बन गये। देवबन्द विधानसाभ क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी ब्रिजेश सिंह की जीत बसपा एंव सपा-कांग्रेस गठबन्धन के भीतरी घात के रूप में देखी जा रही है। इस क्षेत्र में बसपा के माजिद अली कों पार्टी के कई बडे नेताओं का विरोध इस लिये झेलना पडा कि इनकी पत्नी जिला पंचायत की अध्यक्ष है। इसके बाद भी बसपा सुप्रीमो द्वारा क्षेत्र के कई प्रमुख निष्ठावान लोगों की अनदेखी कर जिस प्रकार से माजिद अली को प्रत्याशी बनाया उससे इनका दलित वोट खिसक कर भाजपा की ओर दरक गया। कमोवेश यही स्थिति सपा के माविया अली को भी झेलने पडी। माविया अली देवबन्द नगर पालिका के चेयरमैन से यहां हुये उप चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गये थे। देवबन्द नगर पालिका के अध्यक्ष पद पर माविया ने अपनी पत्नी को चुनाव लडाकर जिता दिया और खुद दोबारा से सपा के टिकट पर विधानसभा के लिए ताल ठोंक दी। लेकिन हार कर बैठ गये। सियासी पन्डितों का मानना है कि अगर माविया नपा के चुनाव में अपनी पत्नी की बजाय किसी अन्य को अध्यक्ष बनवाते तो इसका सीधा लाभ इन्हे मिलता। जिले की नकुड विधानसभा सीट पर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री रहें डा.धर्म सिंह सैनी ने तीसरी बार जीत दर्ज कर यह साबित कर दिया है कि वह बसपा के बगैर भी जीत सकते हैं। सैनी ने इस बार भाजपा के टिकट पर चुनाव जीता है। डा.धर्मसिंह सैनी की जीत इस लिए महत्व पूर्ण है कि इन्होने लगतार दूसरी बार कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद को शिकस्त दी है। डा.धर्मसिंह सैनी लगातार तीसरी बार विधायक चुने गये हैं। विधानसभा के हालिया चुनावी नतीजो ने जिले के दो प्रमुख राजनीतिक घरानों को पुरी तरह से नकार दिया है। केन्द्रीय पूर्व मंत्री काजी रशिद मसूद एंव राज्य के दिवंगत पूर्व मंत्री चौधरी यशपाल सिंह एक समय में न केवल सहारनपुर बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत की धुरी हुआ करते थे, लेकिन पिछले एक दशक से यह दोनों ही परिवार अपने घरेलु कलह के कारण संकट से जुझना पड रहा है।
एम . फरमान की कलम से.............

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