भारतीय चुनाव आयोग की निरीहता : पढ़े लेख

भारतीय चुनाव आयोग की निरीहता : पढ़े लेख

भारतीय चुनाव आयोग की कमजोरी और निरीहता वैसे तो हर चुनाव में किसी न किसी रूप में जाहिर होती रहती है, लेकिन इस बार यह कमजोरी ज्यादा खुल कर दिखी है। आयोग के निष्पक्ष होने या स्वतंत्र चुनाव कराने की उसकी क्षमता पर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। साथ ही यह भी पता चला है कि सरकारें या पार्टियों के नेता या चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार उसकी कितनी कम परवाह करते हैं। आमतौर पर चुनाव आयोग चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद आचार संहिता का उल्लंघन न हो यह सुनिश्चित करने का काम करती रही है। इस लिहाज से आयोग की ओर से उम्मीदवारों के भाषणों या उनके आचरण को लेकर नोटिस जारी किए जाते थे। किसी नेता ने कोई भड़काऊ भाषण दिया जैसे अभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सुरेश राणा ने दिया है। या किसी उम्मीदवार ने बूथ पर चुनाव चिन्ह दिखाए जैसा कि पिछले लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी ने किया था या कोई उम्मीदवार बूथ पर गाड़ी लेकर चला जाए, जैसा इस बार नवजोत सिंह सिद्धू ने किया है, तो ऐसे मामलों में आयोग की ओर से नोटिस देने का चलन है। तय समय से ज्यादा देर तक सभा करने या रुपए बांटने या झंडे लगाने आदि जैसे मुद्दे भी हैं, जिन पर आयोग की ओर से नोटिस जारी किया जाता है। लेकिन आज तक ऐसे किसी मामले की वजह से किसी उम्मीदवार या नेता को सजा हुई हो या किसी का चुनाव रद्द हुआ हो, इसकी मिसाल नहीं है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग देश की दूसरी किसी भी संवैधानिक संस्था के मुकाबले कम शक्ति वाला है। केंद्रीय सूचना आयोग से लेकर केंद्रीय सतर्कता आयोग तक को इसके मुकाबले ज्यादा शक्तियां हैं। उनकी सिफारिश या रिपोर्ट पर कार्रवाई हो सकती है या कम से कम बड़ी खबर बनती है, पर चुनाव आयोग की नोटिसों को शायद ही कोई गंभीरता से लेता है। अदालतों में भी आचार संहिता उल्लंघन के मामले ज्यादा दिन तक नहीं टिकते हैं। इस सामान्य प्रक्रिया से अलग इस बार पांच राज्यों के चुनाव को लेकर कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे आयोग की कमजोरी और जाहिर हुई है। और इसी से वह बुनियादी कारण भी जाहिर हुआ है, जिससे आयोग इतना कमजोर है। असल में सरकार खुद ही आयोग की शक्तियों के प्रति इतनी अगंभीर दिखी, जिससे दूसरे लोगों में यह मैसेज गया कि वे आयोग की अनदेखी कर सकते हैं। चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के बीच इस बार तीन मसले आए थे। पहला मसला चुनाव प्रचार के दौरान बजट पेश करने का था। विपक्ष ने शिकायत की थी कि केंद्र सरकार समय से एक महीना पहले बजट पेश कर रही है और वह इसका चुनावी फायदा उठा सकती है। चुनाव आयोग ने इस बारे में सरकार को नोटिस भेजा। लेकिन सरकार ने दो टूक अंदाज में कह दिया कि तय कार्यक्रम के मुताबिक बजट पेश करेगी। आयोग की ओर से दिए गए सुझावों पर भी सरकार ने ध्यान देना जरूरी नहीं समझा। दूसरा मसला, कैबिनेट के फैसलों की पूर्व मंजूरी का है। आयोग ने कहा था कि उसे इनकी समीक्षा के लिए समय दिया जाए। लेकिन उसके उलट सरकार ने उसे सिर्फ इसकी सूचना देने की औपचारिकता निभाई और आयोग की ओर से बिना सहमति का इंतजार किए कैबिनेट के फैसलों की घोषणा की गई। इस पर आयोग ने नाराजगी भी जताई। तीसरा मसला उम्मीदवारों के लिए बैंक खातों से निकासी की सीमा बढ़ाने का था। आयोग ने रिजर्व बैंक को दो बार लिखा कि वह चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को यह छूट दे कि वे हफ्ते में कम से कम दो लाख रुपए अपने खाते से निकाल सकें। लेकिन रिजर्व बैंक ने उसे टका सा जवाब दिया कि आयोग उम्मीदवारों से कहे कि वे अपने चालू खाते खोल लें। सवाल है कि जब आयोग ने उम्मीदवारों के लिए अनिवार्य किया है कि वे चंदे का पैसा बैंक खातों में ही लेंगे और वहीं से पैसे खर्च करेंगे तो यह सुनिश्चित करना क्या आयोग की जिम्मेदारी नहीं है कि उम्मीदवार जब चाहें अपने खातों से पैसा निकाल सकें? लेकिन आयोग यह मामूली सी सुविधा उपलब्ध कराने में भी नाकाम रहा। चुनाव आयोग के प्रति सरकार के इस रुख का नतीजा है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने न सिर्फ चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया, बल्कि आयोग की ओर से नोटिस भेजे जाने पर उसे खुली चुनौती भी दे डाली। केजरीवाल ने यहां तक कहा कि चुनाव आयोग केंद्र सरकार का पिछलग्गू है और सरकार के निर्देश पर विपक्षी पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। क्या किसी और संवैधानिक संस्था के बारे में ऐसी बात कही जा सकती है? क्या न्यायपालिका के बारे में कोई नेता ऐसा बयान दे सकता है? वैसे यह समय संस्थाओं के क्रमिक ह्रास का समय है, जिसमें सरकारों के साथ साथ विपक्षी पार्टियों के नेता भी शामिल हैं। सीएजी से लेकर सीआईसी और सीवीसी जैसी सभी संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता संदिग्ध बना दी गई है। लेकिन चुनाव कराने वाली संस्था अगर बुनियादी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता नहीं सुनिश्चित कर पाती है या सभी पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए बराबरी का मैदान नहीं सुनिश्चित कर पाती है तो यह बड़े खतरे का संकेत है। बहरहाल, चुनाव आयोग की शक्तियों के सीमित होते जाने का एक कारण यह भी है कि आयोग की ओर से चुनाव सुधारों को लेकर न तो कोई ठोस पहल की जाती है और न उसकी कोई दृष्टि दिखती है। वह सरकारों के भरोसे बैठी है। इससे पहले आखिरी बार जेएम लिंगदोह ने चुनाव सुधारों की पहल की थी। उन्होंने उम्मीदवारों के लिए शैक्षिक योग्यता, आपराधिक मामले और संपत्ति व कर्ज के बारे में जानकारी देने का प्रावधान किया था।

  Similar Posts

Share it
Top