बेतुके बोल के आसरे यूपी चुनाव : पढ़े पूरा लेख

बेतुके बोल के आसरे यूपी चुनाव : पढ़े पूरा लेखबेतुके बोल के आसरे यूपी चुनाव : पढ़े पूरा लेख

राजनीतिक दलों के नेताओं और बेतुके बयानों का चोली दामन का नाता रहाहै। पर चुनाव नजदीक आते ही नेताओं के बयानों का तल्ख और मर्यादित होना आजके चुनावी राजनीति का मानो शगल बन गया है। मौजूदा समय में जब उत्तरप्रदेश का चुनावी पारा सातवें आसमान पर है तो हर इक नेता अपने बयानों केमाध्यम से मीडिया में खुद को बनाये रखना चाह रहे हैं मानों मीडिया मेंबने रहने का मतलब ही चुनाव जीतना हो गया हो। उत्तर प्रदेश चुनाव इन दिनोंएक पार्टी के नेता दूसरे पार्टी के नेता पर आरोप लगाते लगाते हुए अपनीमर्यादाओं की सारी सीमा लांघते हुए नजर आ रहे हैं। यहां कमोबेश सभीपार्टियों के नेता सारी मर्यादाओं को लांघकर, जो मन में आ रहा है वो बोलरहे हैं। चुनाव में नेताओं के द्वारा जमकर विवादित बयान दिया जा रहा है।बार बार इन पार्टी नेताओं ने विवादित बयान देकर कर यूपी चुनाव को मूलमुद्दे से ही भटका दिया है। विवादित बयानों में सबसे अधिक चर्चा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केकब्रिस्तान व श्मशान वाली बयान की हुई। प्रधानमंत्री मोदी बहराइच केचुनावी सभा को संबोधित करते हुए यूपी सरकार पर धार्मिक आधार पर भेदभाव काआरोप लगाया। इस दौरान उन्होंन कहा था कि अगर गांव में कब्रिस्तान बनता हैतो श्मशान भी बनना चाहिए। रमजान में बिजली आती है, तो दीवाली में भी आनीचाहिए। भेदभाव नहीं होना चाहिए। विपक्ष के कई नेताओं ने मोदी के इस बयानकी निंदा भी की थी। प्रधानमंत्री के इस बयान की चैतरफा निंदा भी हुई।विपक्षियों ने मोदी के इस बयान को वोटों का ध्रवीकरण करने की कोशिश सेजोड़कर चुनाव आयोग को ऐसे बयानों पर स्वतः संज्ञान लेने की भी बात कही।दूसरी ओर देश के युवा मुख्यमंत्री का तमगा लिये यूपी सीएम व समाजवादीपार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव रायबरेली के ऊंचाहार में एक चुनावी रैली कोसंबोधित करते हुए अमिताभ बच्चन से यह अपील की कि वह गुजरात के गधों काप्रचार ना करें। जिसके बाद पीएम मोदी ने भी अखिलेश को जवाब देने में देरीनहीं की। पीएम ने कहा मैं गर्व से गधे से प्रेरणा लेता हूं और देश के लिएगधे की तरह काम करता हूं। सवा सौ करोड़ देशवासी मेरे मालिक हैं। गधावफादार होता है उसे जो काम दिया जाता है वह पूरा करता है। सपा नेता राजेंद्र चैधरी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था किनरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों आतंकवादी हैं। दोनों ही लोकतंत्र मेंआतंक पैदा कर रहे हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष ने चुनावी सभा कोसंबोधित करते हुए सपा व बसपा की तुलना कसाब कर एक अलग ही बखेरा खड़ा करदिया। केन्द्रीय मंत्री सुरेश बालियान ने तो यह तक कह दिया कि मुलायमसिंह का मरने का वक्त आ गया है। बालियान ने कहा कि सपा के शासन में यूपीने बुरा राज देखा है। मुलायम ने हमेशा सांप्रदायिकता की राजनीति की है।मैं उनसे कहना चाहुंगा कि अब तो मरने का समय आ गया है। मुजफ्फनगर दंगे केआरोपियों भी शामिल भाजपा विधायक सुरेश राणा ने घोषण कर दिया कि अगर उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो कैरान, देवबंद और मुरादाबाद मेंकफ्र्यू लगा दिया जाएगा। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने मर्यादाओं की सीमा लांघतेहुए एक चुनावी रैली में कहा कि आजम खान ऐसे नेता हैं कि उनका नाम ले लूंतो नहाना पड़ता है। राज्यसभा में भाजपा के सांसद विनय कटियार प्रियंकागांधी से ज्यादा सुंदर भाजपा में अभिनेत्रियां और प्रचारक महिलाएं होनेकी बात कह कर मानों कांग्रेस को बैठे बिठाये ही एक मुद्दा दे दिया।इस बयान के बाद कांग्रेस के कई नेताओं ने आलोचना की और कहा कि इस तरह केबयान सत्ता में बैठी सरकार के लिए सही नहीं हैं। तो वहीं यूपी सरकार मेंमंत्री राम करन आर्या ने कहा है कि वह तो बिना कांग्रेस के भी सरकार बनासकते थे, मगर बहुत बड़े राक्षस को मारने के लिए हमने छोटे-छोटे शैतानों कोइकट्ठा किया है। अगर यह महान राक्षस (भाजपा) आ जाएगा तो इस मुल्क औरप्रदेश में खूनखराबा कर देगा। यूपी के कैबिनेट मंत्री आजम खान कीजिन्होंने यूपी चुनाव में कहा कि मुसलमानों इसलिए ज्यादा बच्चे पैदा करतेहैं क्योंकि उनके पास कोई काम नहीं होता है। आखिर में बात करते हैं बसपासुप्रीमो मायावती ने भाजपा को भारतीय जुमला पार्टी का तमगा तक दे डाला। कुल मिलाकर देखें तो बेतुके बयानों के मामले में कोई भी पार्टी किसीसे कम नहीं है। अब भला कब्रिस्तान, श्मशान, गधा, चेहरे की खूबसूरती,कसाब, मरने का समय, आतंकवादी, जुमला पार्टी जैसे शब्दों व बयानों सेवोटरों का क्या वास्ता ? तो क्या यह माना जा सकता है कि ऐसे बयान वोटरोंके वाजिब सवालों से पलायन करने का जरिया मात्र है ? सवाल यह नहीं कि ऐसेबयानों से क्या राजनेताओं का कोई फायदा होता है कि नहीं बल्कि असल सवालकि इन बयानों से आम आदमी या प्रदेश को क्या फायदा होनेवाला है ? सवाल इनबेतुके बयानों की आड़ में विकास व जरसरोकार के मुद्दों को दरकिनार करने केपीछे की असली मकसद का भी है। मर्यादा भूल ऐसी बयानबाजी कर के हमारेबयानवीर नेता अपने बेमतलब के बयान कौन-सा तीर मारने के फिराक में रहतेहैं ? सवाल यह भी कि क्या चुनाव के समय नेताओं को इस तरह के बयान देनेचाहिए या फिर प्रदेश में हुए अपने कामों को लेकर उसका खुलकर प्रचार करनाचाहिए। निस्संदेह भारतीय राजनीति के प्रौढ़ता काल में नेताओं के बचकानीबयानबाजी भारतीय राजनीति के स्तर को ही नीचा करती है। बेहतर होता कि इनतुच्छ बयानों को छोड़ सत्तादल जहां अपने काम के दम वोटरों को रिझाने वआकर्षित करने का प्रयास करती, वहीं विपक्षी पार्टिया सरकार की असफलताओं वभावी रणनीतियों के माध्यम से वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिशकरती।
विश्वजीत राहा (स्वतंत्र टिप्पणीकार)....................

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