नई दिल्ली: इसरो की इन 7 बड़ी उप्लब्धियों का विश्वभर में बजा डंका

नई दिल्ली: इसरो की इन 7 बड़ी उप्लब्धियों का विश्वभर में बजा डंकाइसरो की इन 7 बड़ी उप्लब्धियों का विश्वभर में बजा डंका

नई दिल्ली : पिछले कुछ सालों में इसरो ने विज्ञान के क्षेत्र में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी कामयाबी दर्ज की है। एसएलवी-3 भारत का पहला स्वदेशी सैटेलाइट लॉन्च वेहिकल था। इस प्रोजेक्ट के डायरेक्टर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम थे। इसरो के मार्स मिशन को सबसे सस्ता बताया जाता है। इस पर करीब 450 करोड़ रुपये खर्च हुए, जिसे पीएम मोदी ने हॉलीवुड फिल्म ग्रेवेटी के खर्चे से भी कम बताया था। 1975 में देश का पहला उपग्रह आर्यभट्ट अंतरिक्ष में भेजा गया। इसका नाम महान भारतीय खगोलशास्त्र के नाम पर रखा गया था। इस सेटेलाइट को कॉसमॉस-3एम प्रक्षेपण वाहन के जरिए कास्पुतिन यान से प्रक्षेपित किया गया था। सबसे खास बात यह थी कि इस उपग्रह का निर्माण पूरी तरह से भारत में ही हुआ था। भारत में इसरो ने बुधवार को मेगा मिशन के जरिए विश्व रिकॉर्ड बना लिया है। पीएसएलवी के जरिए एक साथ 104 सैटेलाइट का सफल लॉन्च किया गया। वैसे अभी तक यह रिकार्ड रूस के नाम है, जो 2014 में 37 सैटेलाइट एक साथ भेजने में कामयाब रहा। इस लॉन्च में जो 101 छोटे सैटेलाइट्स हैं उनका वजन 664 किलोग्राम था। इन्हें कुछ वैसे ही अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया जैसे स्कूल बस बच्चों को क्रम से अलग-अलग ठिकानों पर छोड़ी जाती हैं। पीएसएलवी: इसरो ने 1990 में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) को विकसित किया था। 1993 में इस यान से पहला उपग्रह ऑर्बिट में भेजा गया, जो भारत के लिए गर्व की बात थी। इससे पहले यह सुविधा केवल रूस के पास थी। चंद्रयान: 2008 में इसरो ने चंद्रयान बनाकर इतिहास रचा था। 22 अक्टूबर 2008 को स्वदेश निर्मित इस मानव रहित अंतरिक्ष यान को चांद पर भेजा गया था। इससे पहले ऐसा सिर्फ छह देश ही कर पाए हैं। मंगलयान: भारतीय मंगलयान ने इसरो को दुनिया के नक्शे पर चमका दिया। मंगल तक पहुंचने में पहले प्रयास में सफल रहने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना। अमेरिका, रूस और यूरोपीय स्पेस एजेंसियों को कई प्रयासों के बाद मंगल ग्रह पहुंचने में सफलता मिली। चंद्रयान की सफलता के बाद ये वह कामयाबी थी जिसके बाद भारत की चर्चा अंतराष्ट्रीय स्तर पर होने लगी। जीएसएलवी मार्क 2: जीएसएलवी मार्क 2 का सफल प्रक्षेपण भी भारत के लिए बड़ी कामयाबी थी, क्योंकि इसमें भारत ने अपने ही देश में बनाया हुआ क्रायोजेनिक इंजन लगाया था। इसके बाद भारत को सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने 28 अप्रैल 2016 भारत का सातवां नेविगेशन उपग्रह (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) लॉन्च किया। इसके साथ ही भारत को अमेरिका के जीपीएस सिस्टम के समान अपना खुद का नेविगेशन सिस्टम मिल गया। इससे पहले अमेरिका और रूस ने ही ये उपलब्धी हासिल की थी। तकनीकी मोर्चे पर इस एक साथ 20 उपग्रह लॉन्च करने के अलावा इसरो ने अपना नाविक सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली स्थापित किया और दोबारा प्रयोग में आने वाले प्रक्षेपण यान (आरएलवी) और स्क्रैमजेट इंजन का सफल प्रयोग किया। इस साल इसरो ने कुल 34 उपग्रहों को अंतरिक्ष में उनकी कक्षा में स्थापित किया, जिनमें से 33 उपग्रहों को स्वदेश निर्मित रॉकेट से और एक उपग्रह (जीएसएटी-18) को फ्रांसीसी कंपनी एरियानेस्पेस द्वारा निर्मित रॉकेट से प्रक्षेपित किया। भारतीय रॉकेट से प्रक्षेपित किए गए 33 उपग्रहों में से 22 उपग्रह दूसरे देशों के थे, जबकि शेष 11 उपग्रह इसरो और भारतीय शिक्षण संस्थानों द्वारा निर्मित थे।

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