नोटबंदी पर नीतीश स्टैण्ड का राजनीतिक अर्थ : पढ़े पूरा लेख

2016-11-28 16:00:58.0

नोटबंदी पर नीतीश स्टैण्ड का राजनीतिक अर्थ : पढ़े पूरा लेख

नोटबंदी के खिलाफ जहां पूरा विपक्ष एकजुट होकर सड़क से संसद तक मोदीसरकार को घेरने में व्यस्त है वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नेकई बार अपने बयान में प्रधानमंत्री मोदी के इस फैसले का स्वागत किया है।नीतीश कुमार ने नोटबंदी को प्रधानमंत्री के द्वारा शेर पर सवारी जैसाकरार दे दिया। गौरतलब है कि 13 जुलाई 2013 को बीजेपी के द्वारा नरेंद्रमोदी को प्रधानमंत्री पद का नेता बनाये जाने के विरोध में नीतीश कुमार नेएनडीए से अलग राह अख्तियार कर ली थी, आज उसी मोदी के तारीफ में वह कसीदेपढ़ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है क्या जिस नरेन्द्र मोदी केखिलाफ बिहार में नीतीश ने भाजपा जेडीयू गठबंधन को तोड़ने का ऐलान किया थाउसी गठबंधन को फिर से जोड़ने का सपना पाले हुए हैं ? या फिर मान लिया जायकि लालू के गठबंधन करने की भूल को अब वह सुधारने के मूड में हैं बहरहाल नीतीश कुमार के बयानों को लेकर एक तरफ दिल्ली से बिहार तक कीसियासत गरमाई हुई है। तो दूसरी ओर खबर आ रही है कि बिहार के मुख्यमंत्रीनीतीश कुमार ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से हाल ही मेंमुलाकात की है। हालांकि भाजपा के नेता इसे बड़े नेताओं के बीच शिष्टाचारभेंट कह रहे हैं, पर अंदरखाने से कुछ और ही खिचड़ी पकती हुई प्रतीत होतीहै। खबर है कि इन दोनों राजनीतिक दिग्गजों की मुलाकात की व्यवस्था चुनावीरणनीतिकार के महारथी प्रशांत किशोर ने कराई। प्रशांत किशोर को बीजेपी केराष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनोंके ही करीबी माना जाता हैं। सवाल यह कि अपने धुर विरोधी पार्टी के मुखियासे मुलाकात के क्या मायने हैं ? इस खबर से भाजपा नेताओं का नीतीश कुमारके संपर्क में होने की अफवाह को बल मिलता है। गौरतलब है कि बिहार केमुख्यमंत्री और जेडीयू नेता नीतीश कुमार ने खुले तौर पर मोदी सरकार केनोटबंदी के फैसले का समर्थन किया है, जबकि उन्हीं के पार्टी के कद्दावरनेता शरद यादव नोटबंदी के खिलाफ हैं। दूसरी ओर बिहार सरकार के शिक्षामंत्री अशोक चौधरी ने कहा कि नोटबंदी पर कांग्रेस का अलग विचार है।उन्होंने स्पष्ट कहा कि आलाकमान के फैसले के बाद किसी भी समय महागठबंधनसे कांग्रेस पार्टी अलग हो सकती है। ऐसा पहली बार है जब महागठबंधन सेजुड़े किसी बड़े नेता ने इस तरह से गठबंधन तोड़ने का सीधा ऐलान किया हैजो यह बताने के लिए काफी है कि बिहार सरकार चला रही जेडीयू-राजद-कांग्रेसमहागठबंधन में सबकुछ ठीक नहीं है। ऐसे में गठबंधन टूटने के आसार ज्यादानजर आते हैं। इससे पहले ममता बनर्जी की अगुआई में नोटबंदी के खिलाफ हुएराष्ट्रपति भवन तक के विपक्ष के मार्च से भी नीतीश ने किनारा कर लिया।इतना ही नहीं उन्होंने बेनामी संपत्ति पर कार्रवाई की मांग तक कर दी। हालांकि भाजपा से दोस्ती नीतीश के लिए हमेशा फायदेमंद रही। अटल बिहारीवाजपेयी सरकार में नीतीश को केंद्र में रेल और कृषि जैसे अहम विभाग मिला।फिर इसी गठबंधन में वह बिहार के मुख्यमंत्री बने। 2014 के लोकसभा चुनावमें अपनी पार्टी की करारी हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने बिहार केमुख्यमंत्री पद को भी त्याग दिया। लेकिन बाद में अपनी गलती का एहसास होनेपर वह फिर से मुख्यमंत्री बने, लेकिन लालू यादव के राजद के पाले में जाबैठे। बीजेपी से रिश्ता तोड़ने का फायदा उन्हें बिहार विधानसभा चुनाव मेंसिर्फ इतना ही हुआ कि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई। लेकिन एनडीएकाल में उनके जितने विधायक थे, उनकी संख्या घटकर लगभग आधी रह गई। ऐन केनप्रकारेण मुख्यमंत्री की कुर्सी तो बच गई लेकिन पूर्व की भांति वे बिनारूकावट के सत्ता चलाने में असमर्थ हो गये। यह नीतीश की राजनीतिक मजबूरीही है कि अपनी साफ छवि के बावजूद उन्हें लालू यादव के एक ऐसे बेटे कोमंत्री बनाना पड़ा है, जिसको राजनीति का न तो ककहरा पता है और न सलीका।इसके अलावे गठबंधन धर्म का लिहाज किये बिना लालू के द्वारा जेडीयू केमुस्लिम विधायकों पर डोरे डालने की भी खबर आती रही है। गौरतलब है कि लालू यादव के जंगलराज के खिलाफ ही नीतीश कुमार ने अपनेलालू विरोध की राजनीति शुरू की थी। लेकिन राजद के साथ गठबंधन में सत्तासंभालने के बाद से जंगलराज लौट आने का इल्जाम लगता रहा है। नीतीश कीपरेशानी यह भी है कि लालू अपने बेटों का राजनीतिक कद बढ़ाने की रणनीति केतहत काम कर रहे हैं। चारा घोटाले में सजायाफ्ता होने के कारण वह खुदसत्ता संभाल नहीं सकते, इसलिए सामने आकर मोर्चाबंदी तो नहीं कर रहे।लेकिन उनका प्रयास नीतीश पर दबाव बनाये रखने की होती है। लालू के दबाव केकारण ही सीवान के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन की पटना हाई कोर्ट में जमानतकी अर्जी का बिहार सरकार ने विरोध नहीं किया था। लेकिन जब सोशल मीडिया सेलेकर राष्ट्रीय मीडिया तक ने इसे मुद्दा बनाया और प्रशांत भूषण ने पटनाहाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी तो मामला उल्टा पड़गया और शहाबुद्दीन को दोबारा जेल जाना पड़ा। इस मामले में बिहार सरकार कीखूबब किरकिरी हुई। इससे नीतीश की सुशासन बाबू वाली छवि भी जाती रही। इसलिहाज से देखा जाय तो मोदी उनके लिए लालू से ज्यादा फायदेमंद साबित होसकते हैं। बहरहाल अगर नीतीश भाजपा के पाले में आ जाते हैं जैसा कि उनके बयानों सेजाहिर हो रहा है तो यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से गठबंधनकी क्षीण संभावना भी पूरी तरह से खत्म हो जाएगी और यूपी में भाजपा औरजेडीयू मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं। इससे जेडीयू को फायदा मिले या न मिलेपर भाजपा को जरूर फायदा मिलेगा। उधर बिहार में बीजेपी के 53 और जेडीयू के71 विधायकों को मिलाकर 124 विधायक होते हैं जो 245 सीट वाले बिहार मेंनीतीश की अगुवाई में सरकार बनाने के लिए काफी है। ऐसे में देखना दिलचस्पहोगा कि नीतीश कुमार का अगला कदम क्या भाजपा की तरफ बढ़ता है। विश्वजीत राहा (वरिष्ठ पत्रकार)

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