साम्यवादी शासन के एक युग का अंत : पढ़े

साम्यवादी शासन के एक युग का अंत : पढ़े

क तरफ आज जहां पूरी दुनिया में पूंजीवाद का जयकारा और वामपंथ फीकापड़ता नजर आ रहा है, वहीं उत्तरी अमेरिका की समुद्री सीमा से मात्र 100मील दूर दक्षिण में एक बड़ी मछली जैसा दिखने वाला द्वीप राष्ट्र क्यूबामें आज भी वामपंथी कम्युनिस्टों का राज है। यह विश्व के उन इक्के दुक्केदेशों में से एक है जो उपभोक्तावाद, बाजारवाद और पूंजीवाद से काफी दूरहै। बीते 26 नवंबर को इसी क्यूबा के कम्युनिस्ट राज की स्थापना करने वालेपूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो का 90 वर्ष के उम्र में निधन हो गया।कास्त्रो ने 17 साल तक बतौर प्रधानमंत्री और फिर 32 साल तक बतौरराष्ट्रपति बन तानाशाह की भांति देश पर राज किया। क्यूबा में लगभग 50 वर्षों तक शासन करने वाले कास्त्रो एक अमीरव्यापारी और घरेलू नौकरानी के नाजायज औलाद थे। अमीर और गरीब के बीच पनपतीअसमानता को वह सीधे तौर पर देख पाने के कारण उनके मन में पूंजीवाद केखिलाफ एक अजीब सी घृणा थी। छात्र राजनीति में इसका असर देखा गया जहांउनके विरोधी तेवर जल्द ही सबकी नजरों में आ गए। सरकार की आलोचना करनेवाले उनके भाषण बहुत जोरदार होते थे। बहुत जल्द ही पूरे देश में उनकीचर्चा होने लगी। 50 के दशक में अमेरिकी समर्थित तानाशाह बटिस्टा केद्वारा अपने कॉमरेडों पर होने वाले अत्याचारों को देखकर फिदेल का मनप्रजातंत्र से उचट गया। तब उन्होंने हथियारबंद क्रांति का रास्ता अपनाया।इसी दौरान उन्होंने बटिस्टा के खिलाफ पहला असफल जंग छेड़ा। देश के खिलाफजंग के आरोप में उन्हें 15 साल की जेल की सजा दी गई। जिद्दी स्वभाव केकास्त्रो ने 1956 में एक बार फिर क्यूबा क्रांति का शंखनाद किया जिसेउन्होंने गरीबों के हक की लड़ाई करार दिया था। तीन साल के तमाम उठापटक केबाद 1959 में उन्होंने क्यूबा के तानाशाह बटिस्टा का तख्तापलट कर दिया।इसके बाद कास्त्रो की राष्ट्रीय हीरो की जो छवि बनी वह आज तक बरकरार है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में रूचि रखने वाले लोग पश्चिमी जगत मेंसर्वप्रथम साम्यवादी सत्ता स्थापित करने वाले फिदेल कास्त्रो को महानकम्युनिस्ट के साथ-साथ हिम्मती भी मानते हैं। पूरी दुनिया अमेरिका कीताकत के आगे झुकती नजर आती है, वहीं उसी की नाक के नीचे क्यूबा ने न केवलवामपंथ का हाथ मजबूती से पकड़े रखा, बल्कि अमेरिका से दो दो हाथ करने सेभी हिचके। कट्टरवादी सोच रखने वाले कास्त्रो की अमेरिका से पंगा लेने कीआदत को दुनिया भर में काफी दिलचस्पी से देखा जाता रहा है। वह खुलेआमअमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन रह चुके सोवियत यूनियन से दोस्ती रखने कादुस्साहस करता था। 1960 में क्यूबा में स्थित अमेरिकी फैक्ट्रियों परक्यूबा ने जब कब्जा जमाया तो अमेरिका का खून खौल गया था। गौरतलब है किक्यूबा क्रांति के दौरान ही उनके नेतृत्व में अमेरिका को भी लपेटे मेंलिया गया था। क्यूबा में उन्होंने अमेरिकी फैक्ट्रियों और प्लांटेशन परकब्जा कर लिया गया था। सत्ता संभालने के बाद में सोवियत यूनियन से क्यूबाने हाथ मिलाया और अमेरिका द्वारा हमले के खतरे को भांपते हुए सोवियत नेअमेरिका के पुरजोर विरोध के बावजूद क्यूबा में एक परमाणु मिसाइल बेस भीबनाया। आइजनहावर, निक्सन, फोर्ड, बुश और क्लिंटन जैसे कई धुरंधर अमेरिकीराष्ट्रपति का सामना करने वाले कास्त्रो के नाक में नकेल कोई भी डाल सका।भले ही अमेरिका ने इसके खिलाफ क्यूबा पर कैसा भी आर्थिक प्रतिबंध क्यों नलगा हो। लेकिन सोवियत यूनियन के ढह जाने के बाद क्यूबा की अर्थव्यवस्थाको गहरा धक्का पहुंचा। फिर भी फिदेल कास्त्रो ने तब भी अमेरिका से हाथमिलाना मुनासिब नहीं समझा। उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को सीमित निजीएंटरप्राइज के लिए ही खोला। इसका असर आज भी क्यूबा में अन्य देशों केमुकाबले बाजारीकरण की झलक कम देखने को मिलती है। हालांकि अमेरिका औरक्यूबा के मौजूदा रिश्तों की बात है तो 2015 में क्यूबा के राष्ट्रपतिराउल ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से कूटनीतिक संबंधों को सामान्यकरने के लिए मुलाकात की। दुनिया भर के देशों ने इस बेहद खास मुलाकात मेंदिलचस्पी दिखाई जिसे दो विपरीत विचारधाराओं का मिलन समझा गया। अमेरिका औरक्यूबा के कड़वाहट भरे रिश्ते को कास्त्रो के निधन के बाद अमेरिका केनवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोलाल्ड ट्रंप के वक्तव्य और वहां के लोगों केद्वारा मनाये गये जश्न से भी समझा जा सकता है। दूसरी ओर फिदेल कास्त्रो के तानाशाही रवैये के कारण करीब पांच दशक केशासनकाल में क्यूबा के कई परिवार कम्युनिस्ट क्रांति के कारण बंट गए।इसमें खुद उनका परिवार भी शामिल है। जहां क्यूबा के महान क्रांतिकारीनेता के भाई राउल उनके सबसे करीबी विश्वासपात्र बने और उनके बादराष्ट्रपति भी बने, वहीं उनकी बहन जुआना दक्षिण फ्लोरिडा में निर्वासितजीवन जीने को मजबूर हो गई। उन्होंने समाजवाद के साथ एक अधिनायकवादी,दमनात्मक और निष्ठुर शासन की स्थापना की। कास्त्रो ने विपक्षी दलों केनेताओं को या तो जेलों में ठूंस दिया या मृत्युदंड दे दिया। प्रेस परअंकुश लगाने के साथ अभिव्यक्ति की आजादी को भी छीन लिया। सत्ता पर कब्जाहोते ही सारे अमेरिकी निवेश व उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। विश्व के विवादास्पद नेताओं में शामिल फिदेल कास्त्रो ने एक बार देश कीजनता को शिक्षित करने की ठानी तो इतना बड़ा अभियान चलाया कि केवल एक सालमें देश के 95 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को शिक्षित कर दिया। आज भी लेटिनअमेरिका के किसी देश में इस देश से ज्यादा शिक्षित दर नहीं। क्यूबा मेंस्वास्थ्य सेवाएँ सरकारी हैं और बेहतरीन हैं। नतीजतन क्यूबा की शिशुमृत्यु दर करीब सात प्रति हजार है जो अमेरिका से भी थोड़ा बेहतर है।कास्त्रो के लोकप्रिय होने का मुख्य कारण भी मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएँ औरशिक्षा है। सन 2008 में राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र देकर अपने भाई राउलकास्त्रो की ताजपोशी कर दी। अपने अंतिम दिनों में कास्त्रो अखबारों मेंकॉलम लिखा करते थे और देश और विदेश की नीतियों पर अपनी राय रखते थे। किसीके लिए कास्त्रो एक महान क्रांतिकारी थे जिन्हें दबे-कुचले वर्ग का मसीहासमझा जाता रहा, तो किसी के लिए वह एक तानाशाह है जिन्होंने क्यूबा केलोगों को अपनी मनमानी का शिकार बनाया। यह तो इतिहास बतायेगा कि कास्त्रोतानाशाह थे या अच्छे शासक पर, उनके निधन के साथ ही दुनिया में साम्यवादीशासन के एक युग का अंत अवश्य हो गया।
विश्वजीत राहा (वरिष्ठ पत्रकार) की कलम से .......

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