नोटबंदी फैसले का अंधसमर्थन और अंधविरोध दोनों ही संवेदनहीन : पढ़े पूरी स्टोरी..

नोटबंदी फैसले का अंधसमर्थन और अंधविरोध दोनों ही संवेदनहीन : पढ़े पूरी स्टोरी..

आज 14वां दिन है नोटबंदी का वही लंबी-लंबी लाइनें गिरता व्यापार और परेशान लोगतो क्या नोटबंदी का फैसला गलत था? क्या 1000 और 500 रुपए के नोटों पर बैन लगाकर नरेन्द्र मोदी ने अपनी दायित्वविहीन सामाजिक अपरिपक्वता का परिचय दिया है? इस सवाल का उत्तर समझने से पहले कुछ अन्य बिंदुओं पर भी ध्यान देते हैं। क्या नोटबंदी का विरोध करने वाला हर एक व्यक्ति वही है, जिसने ब्लैकमनी छिपा रखा है? अगर आप इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि हर एक देशभक्त आंखें बंद करके नोटबंदी का समर्थन कर रहा है या उसे कोई परेशानी नहीं हो रही है तो निश्चित ही आप अन्धभक्त ही कहे जाएंगे। क्योंकि रिक्शा चलाने वाले से लेकर और दिहाड़ी पर मजदूरी करने वाले भी इस फैसले से परेशान दिख रहे हैं और उनके पास ना ही ब्लैकमनी है और ना ही वे भ्रष्टाचारी हैं। वे परेशान नोटबंदी के फैसले से नहीं बल्कि इसके क्रियान्वयन से हैं। अगर आप किसी भी सामान्य व्यक्ति से बात करेंगे और उससे पूछेंगे कि अगर इस फैसले से भविष्य में देश का या आम आदमी का फायदा होता है तो क्या यह फैसला ठीक है? इस प्रश्न के जवाब में कोई नहीं में जवाब नहीं देगा। हालांकि वह अपनी परेशानी बताएगा, अपने ज्ञान और विवेक के आधार पर कुछ सुधाव देगा लेकिन केन्द्र सरकार को संवेदनहीन, बेवकूफ, या पागलों का झुंड नहीं कहेगा। दूसरी ओर इस फैसले के क्रियान्वयन में जो नुकसान हुए हैं या हो रहे हैं, यदि उनका मजाक उड़ाया जाए या उनका अपमान किया जाए तो इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा। इस फैसले से जिनको सच में नुकसान हुआ है, उनके दर्द की आवाज को हथियार बनाकर राजनीति भी की जा रही है और की भी जाएगी क्योंकि हमारे अपने नेताओं की राजनीतिक दायित्व की शुचिंता शून्य तक पहुंच गई है। हमने जिनको चुना है, हम जिनके पीछे चलते हैं, इस विश्वास के साथ कि वे सही रास्ते पर ही चलेंगे, ऐसे लोग बिना प्रमाणिकता के एक चोर को गरीब जनता का प्रतिनिधि घोषित करके उस चोर की आत्महत्या को शहादत जैसा बताने की कोशिश करते हैं और प्रधानमंत्री को इसके लिए जिम्मेदार बताकर कटघरे में खड़ा कर देते हैं। ऐसा कोई नहीं है जिसे इस फैसले से परेशानी ना उठानी पड़ी हो। एक कट्टर मोदीभक्त से लेकर एक कट्टर मोदी विरोधी तक, सभी को परेशानी उठानी पड़ रही है, लेकिन लोग एक उम्मीद के साथ ये परेशानियां सहने को तैयार हैं। ये लोग जो लंबी-लंबी लाइनों में खड़े दिखते हैं, और नोटबंदी से हो रही परेशानियों के बारे में पूछने पर बहुत खुश होकर यह जताने की कोशिश करते हैं कि उन्हें कोई परेशानी नहीं हैं, ये लोग नोट बदलने के लिए नहीं बल्कि देश बदलने के लिए इन परेशानियों को सह रहे हैं। नोटबंदी के फैसले के क्रियान्वयन की कमियों पर सामान्य जनमानस की परेशानियों पर सवाल जरूर उठने चाहिए लेकिन साथ ही सवाल उन लोगों पर भी उठने चाहिए जो एक समय बाबा रामदेव के साथ 1000 और 500 के नोटों पर तत्काल प्रतिबंध की मांग का समर्थन कर रहे हैं, वे आज आखिर क्यों इस फैसले पर विरोधी सुर अपनाकर छोटीगंगा बहा रहे हैं? आज अरविंद केजरीवाल को देश की जनता को बताना चाहिए कि 2012 वाला वह अरविंद केजरीवाल असली था या आज का अरविंद केजरीवाल असली है। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर तो यही लगता है कि केजरीवाल साहब उस समय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का चेहरा बनकर अपना राजनीतिक करियर चमकाना चाह रहे थे, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली और आज सिर्फ विरोध की राजनीति करके अपने अस्तित्व को लोगों के मानस में बचाए रहना चाहते हैं। इन 14 दिनों में संवेदनशीलता की एक नई परिभाषा को चरितार्थ होते हुए देखा। हमने देखा कि 4 घंटे से लाइन में लगे एक छोटे से किसान, एक मजदूर और एक महिला की परेशानी के लिए हमारे नेता सड़क पर उतरें हैं। अच्छा लगा कि वे आम आदमी के दर्द को महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन पीड़ा तब होती है जब वही लोग सवा सौ करोड़ के प्रधान की आंखों के आंसुओं को नौटंकी बताते हैं। राजनीति को नकारात्मकता के चरम तक पहुंचाने वाले ये लोग अगर ऐसा सोचते हैं कि देश उन्हें समझ नहीं रहा, तो यह उनकी भूल है क्योंकि देश सब देख रहा है। मैं नहीं जानता कि इस नोटबंदी का परिणाम क्या होगा लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूं कि देश की सत्ता के सिंहासन पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जो बड़े फैसले लेने की हिम्मत रखता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ समस्या यह थी कि उनमें ऐसे निर्णय लेने की इच्छाशक्ति नहीं थी। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस राजनीतिक दल से वह आते हैं, उसने उन्हें इतने अधिकार ही नहीं दिए थे।
क बात और ऐसा नहीं है कि नोटबंदी का फैसला, बीजेपी का फैसला है। बीजेपी के कई नेता, सरकार में बैठे कई लोग, राष्ट्रवादी विचारधारा के होने का दावा करने वाले कई संगठन इस फैसले से घबराए हुए हैं क्योंकि भ्रष्टाचार पर कांग्रेस का कॉपीराइट तो था नहीं। कहीं से तो शुरुआत करनी ही थी। शुरुआत हुई है, भविष्य में लिखा जाने वाला इतिहास तय करेगा कि इस फैसले से हमें और आपको कितना फायदा हुआ। लेकिन इन सबके बीच आपको एक आम नागरिक होने के नाते, एक भारतीय होने के नाते ऐसा फैसला लेने के लिए दिखाई गई इच्छाशक्ति की सराहना तो करनी ही चाहिए। लोग कह रहे हैं कि यह जल्दबाजी में लिया गया फैसला है, सरकार ने तैयारी नहीं की, सरकार ने समय नहीं दिया, सरकार को नोट बदलने के लिए समय दिया जाना चाहिए था। परेशानी मुझे भी हो रही है लेकिन मैनेज करने की कोशिश कर रहा हूं क्योंकि मैं समझ रहा हूं कि यदि नोटबैन करने से 2 महीने या 1 महीने पहले बता दिया जाता तो जितनी देर में आप 10-20 हजार रुपये के नोट बदलते, उतनी देर में ब्लैकमनी संचित करके रखे हुए लोग हजारों करोड़ रुपये बदल लेते। रही बात जल्दबाजी और सरकार की तैयारी की तो मुझे लगता है कि सरकार द्वारा लगातार उठाए जा रहे कदम तथा नीतियों में लगातार हो रहे बदलाव इस बात को प्रदर्शित करते हैं कि सरकार ने आगे की योजना का पूरा ब्लू प्रिंट तैयार कर रखा है। ऐसे कदमों का कोई सही समय नहीं होता। जिस समय सरकार ने ऐसी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया, वह अपने आप में बिल्कुल सही समय है। यह बात सच है कि हमारे देश में जितना ब्लैक मनी है उससे कई गुना ज्यादा ब्लैक मनी स्विस बैंक में भरा पड़ा है। सरकार के नियंत्रण में हमारा अपना देश है, सफाई की शुरुआत अपने घर से ही की जाती है। स्विस बैंक के ब्लैक मनी को निकालने के और कई रास्ते हैं, सरकार आगे क्या कदम उठाएगी वह तो बाद में ही पता लगेगा लेकिन उन कदमों के इंतजार में घर की सफाई भी ना की जाए, यह तो पूर्ण रूप से अव्यावहारिक है। सरकार के इस कदम से निश्चित ही मुझे मेरे जैसे सभी आम नागरिकों को परेशानी हो रही है लेकिन हमें यह भी पता होना चाहिए कि इससे नकली नोट छापने वालों को, आतंकियों को, नक्सलियों को, कश्मीर में पत्थरबाजों को पैसा देने वालों को, टैक्स चोरों को, बिस्तर और तकियों में नोट भरकर रखने वालों को बड़ा नुकसान हुआ है और उनके नुकसान का हमें भले ही तत्कालिक लाभ ना हो लेकिन दीर्घकालिक लाभ अवश्य होगा।

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