नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मांगी लोकपाल बिल में संशोधन पर संसदीय समिति की रिपोर्ट

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मांगी लोकपाल बिल में संशोधन पर संसदीय समिति की रिपोर्ट

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से लोकपाल बिल में संशोधन की सिफारिश करने वाली संसदीय समिति की रिपोर्ट पेश करने को कहा है। ताकि ये पता चल सके कि नेता विपक्ष की जगह लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को सर्च कमेटी में शामिल करने के अलावा और कौन कौन से संशोधनों का सुझाव कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में दिया है। इस मामले में कोर्ट 14 दिसंबर को फिर सुनवाई करेगा। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है। बुधवार को लोकपाल की नियुक्ति के मामले में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अटार्नी जनरल ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने पिछली सुनवाई पर कोर्ट द्वारा लोकपाल की नियुक्ति में हो रही देरी पर जताई गई नाराजगी और चिंता से सरकार के उच्चस्थ जिम्मेदार लोगों को अवगत कराया है। उन्होंने बताया कि संसदीय समिति ने लोकपाल बिल में संशोधन पर अपनी रिपोर्ट सौंपी है रिपोर्ट फिलहाल सरकार के पास विचाराधीन है। कोर्ट ने कहा कि अगर सिर्फ नेता विपक्ष की ही बात है तो इसका हल तो कोर्ट अपने आदेश से ही निकाल सकता है। रोहतगी ने कहा कि बाकी सिफारिशें तो तकनीकी हैं लेकिन फिर भी वे रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल कर देंगे ताकि कोर्ट जान सके कि और किन चीजों में संशोधन की बात कही गयी है। उधर याचिकाकर्ता संस्था कामनकाज की ओर से पेश प्रशान्त भूषण ने कहा कि बिल में एक मात्र महत्वपूर्ण संशोधन सिर्फ नेता विपक्ष के बारे में ही होना है बाकी तकनीकी पहलू भर हैं। भूषण ने कहा कि 1977 का एक्ट पहले से मौजूद है जिसमें नेता विपक्ष को परिभाषित किया गया है। उसके मुताबिक लोकसभा में सबसे बड़े दल के नेता को नेता विपक्ष माना जाएगा लेकिन सरकार है कि पहले स्पीकर के स्टेटमेंट पर अड़ी है जिसमें लोकसभा की कुल संख्या के दस फीसद सदस्यों वाले दल को नेता विपक्ष का दर्जा दिये जाने की बात कही गयी है। भूषण ने कहा कि सीबीआई और सीवीसी की नियुक्ति भी बहुत महत्वपूर्ण होती है कोर्ट ने उस मामले में आदेश दिये थे। वैसा ही आदेश इसमें भी दिया जाए क्योंकि काफी संघर्ष के बाद लोकपाल कानून बना है। वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण ने कोर्ट से इस बारे में आदेश पारित करने का आग्रह करत हुए कहा कि लोकपाल कानून बने तीन साल बीत चुके हैं ऐसे में कानून लागू न होने के लिए किसे जिम्मेदार माना जाए। न्यायपालिका की भी जिम्मेदारी है कि जो कानून बना है उसे लागू कराए। 1977 के कानून के मुताबिक नेता विपक्ष को परिभाषित किया जाए। लेकिन रोहतगी ने विरोध करते हुए कहा कि वो कानून इस मामले मे लागू नहीं हो सकता क्योकि उसमें भी कहा गया है कि नेता विपक्ष को लोकसभा अध्यक्ष मान्यता देगा। बाद मे कोर्ट ने रिपोर्ट पेश करने का समय देते हुए सुनवाई 14 दिसंबर तक टाल दी।

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