प्रेम का संदेश देता क्रिसमस त्योहार

2016-12-19 15:15:21.0

प्रेम का संदेश देता क्रिसमस त्योहार

अन्य समाजों की तुलना में ईसाई लोग बहुत कम त्योहारों को मनाते हैं। ईसाइयों के दो ही मुख्य त्योहार हैं। पहला क्रिसमस जो कि यीशु के जन्म को मनाने का त्योहार है और दूसरा ईस्टर जो यीशु मसीह के पुनरुत्थान की याद में मनाए जाने वाला त्योहार है। क्रिसमस प्रेम का संदेश देने वाला त्योहार है। संत यूहन्ना लिखते हैं, परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उसमें विश्वास करे, नाश न हो, परंतु अनंत जीवन पाए। क्रिसमस एक अनोखा पर्व है जो ईश्वर के प्रेम, आनंद एवं उद्धार का संदेश देता है। यह पर्व करीब 2000 वर्ष पूर्व यीशु ख्रीस्त के मनुष्य के रूप में जन्म लेने की याद में मनाया जाता है। जनांकिकी वैज्ञानिकों के अनुसार विश्व के 600 करोड़ लोगों में से करीब एक-तिहाई ईसाई लोग हैं। इनमें से करीब 60 प्रतिशत रोमन कैथोलिक हैं तथा बचे हुए 40 प्रतिशत कई प्रोटेस्टेंट समुदाय के हैं। भारत में ईसाइयों का प्रतिशत केवल 2.3 है अर्थात ईसाइयों की कुल संख्या 3 करोड़ से भी कम है। ईसाई समुदाय भारत के कुछ प्रांतों में पहली शताब्दी से ही अस्तित्व में रहे हैं। ईसा के बारह चेलों में से एक जिनका नाम संत थॉमस था, जो भारत के दक्षिण भाग में आए और भारत में ही उनकी हत्या हुई। थॉमस ने दक्षिण भारत में कई कलीसियों की स्थापना की। संत थॉमस की कब्र चेन्नई के पास मइलापुर शहर में स्थित है और आज भी अनेक तीर्थ यात्री उसके दर्शन के लिए विश्व के कई स्थानों से वहाँ पहुँचते हैं। अन्य समाजों की तुलना में ईसाई लोग बहुत कम त्योहारों को मनाते हैं। ईसाइयों के दो ही मुख्य त्योहार हैं। पहला क्रिसमस जो कि यीशु के जन्म को मनाने का त्योहार है और दूसरा ईस्टर जो यीशु मसीह के पुनरुत्थान की याद में मनाए जाने वाला त्योहार है। क्रिसमस प्रेम का संदेश देने वाला त्योहार है। संत यूहन्ना लिखते हैं, परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उसमें विश्वास करे, नाश न हो, परंतु अनंत जीवन पाए। (यूहन्ना 3ः16) यीशु मसीह के मानव अवतार एवं जीवन ईश्वर के महान प्रेम को दर्शाता है। मानव जाति के पापों के प्रायश्चित के लिए यीशु मसीह ने अपने जीवन को बलिदान के रूप में क्रूस पर दिया। यह ईश्वर का असीम प्रेम का प्रदर्शन है। पवित्र शास्त्र बाइबल में लिखा है परमेश्वर प्रेम है। परमेश्वर के प्रेम में कोई भेदभाव नहीं है अर्थात परमेश्वर का प्रेम विश्व के सभी जाति, जनजाति, प्रजाति, राष्ट्र एवं समुदाय के स्त्री-पुरुषों के लिए है। ईसा मसीह ने क्रूस पर अपनी जान देकर ईश्वर का अपार प्रेम प्रकट किया। इस प्रेम से प्रभावित होकर लाखों लोग अपना सब कुछ त्यागकर ईसा के शिष्य बने और उनके सुसमाचार के प्रचार के लिए अपने प्राण तक बलिदान किए। इस प्रेम का वर्णन करते हुए संत पोलूस लिखते हैं, प्रेम धीरजवंत है और कृपालु है, प्रेम डाह नहीं करता, प्रेम अपनी बढ़ाई नहीं करता और फूलता नहीं। वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुँझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता। वह सब बातें सह लेता है, सब बातों का प्रतीति करता है, सब बातों की आशा रखता है। प्रेम कभी ढलता नहीं। (१ करिन्यियों अध्याय:१३) सभी धर्म को इसी प्रकार के प्रेम में विश्वास रखना चाहिए और उसे अपने कार्यों में प्रकट करना चाहिए। अगर सभी इस प्रकार की प्रेम भावना रखते तो सभी पूर्वग्रह, संघर्ष एवं आतंक विश्व से समाप्त हो जाएगा। धर्म अगर पारस्परिक प्रेम को बढ़ावा नहीं देता तो वह धर्म है ही नहीं। क्रिसमस मानव जाति के उद्धार के लिए परमेश्वर के द्वारा की गई पहल को दर्शाने वाला त्योहार भी है। संत पौलूस जोर देकर कहते हैं, यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है कि मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिए जगत में आया। (तीमुथियुस 1ः15) यह एक गूढ़ तथ्य है कि मसीह के क्रूस पर मरने से मानव जाति का उद्धार किस प्रकार से हो सकता है? बाइबल स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि लहू बहाए बिना कोई उद्धार नहीं। हम जब पापी थे, मसीह ने अपनी जान देकर हमारा उद्धार किया है। उद्धार परमेश्वर का मुफ्त दान है और मनुष्य अपने अच्छे कर्मों द्वारा इसे प्राप्त नहीं कर सकता। सभी ने पाप कर परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध कार्य किया है। ईसा मसीह हमें बहुदायक धार्मिक जीवन देने आए हैं। कई लोगों में यह धारणा है कि सचमुच धार्मिक बनने के लिए सांसारिक जीवन को त्यागना एवं संन्यास लेना आवश्यक है। परमेश्वर के आशीषों को पाने के लिए दुनिया छोड़ना जरूरी नहीं है। इस संसार में अन्य लोगों के बीच रहते हुए तथा अपने सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी परमेश्वर के निकट उनके बताए हुए मार्ग पर चल सकते हैं। बाइबल में ईसा मसीह को अच्छा गडरिया नाम से संबोधित किया गया है। एक अच्छा गडरिया भेड़ों की सभी आवश्यकताओं पर ध्यान रखता है और उसकी देखभाल में लगा रहता है। क्रिसमस का सही अर्थ एवं संदेश समझने के लिए ईश्वर हममें से प्रत्येक को प्रेरणा दें। क्रिसमस के इस पावन पर्व में ईश्वर का अनुग्रह हममें से प्रत्येक के साथ बना रहे। ईसा मसीह के जन्म की कथा बाइबिल के अनुसार माता मरियम के गर्भ से ईसाई धर्म के ईश्वर ईसा मसीह का जन्म हुआ था। ईसा मसीह के जन्म से पूर्व माता मरियम कुंवारी थी। उनकी सगाई दाऊद के राजवंशी यूसुफ नामक व्यक्ति से हुई थी। एक दिन मरियम के पास स्वर्गदूत आए और उन्होंने कहा कि जल्द ही आपकी एक संतान होगी जो इस संसार को कष्टों से मुक्ति का रास्ता दिखलाएगी। माता मरियम ने संकोचवश कहा कि मैं तो अभी अविवाहित हूं, ऐसे में यह कैसे संभव है। देवदूतों ने कहा कि यह सब एक चमत्कार के माध्यम से होगा। जल्द ही माता मारियम और यूसुफ की शादी हुई। शादी के बाद दोनों यहूदिया प्रांत के बेथलेहेम नामक जगह रहने लगे। यहीं पर एक रात अस्तबल में ईसा मसीह का जन्म हुआ। ईसा मसीह के जन्मोत्सव को ही लोग आज भी क्रिसमस के रूप में मनाते हैं। ईसा मसीह की शिक्षाएं ईसा मसीह ने दुनिया को एकता और भाईचारे की सीख दी। उन्होंने लोगों को भगवान के करीब रहने का मार्ग दिखाया।' ईसा मसीह ने क्षमा करने और क्षमा मांगने पर जोर दिया। उन्होंने अपने हत्यारों को भी माफ किया। सांता क्लॉज और क्रिसमस केक, तोहफों, आपस में मिलने जुलने और क्रिसमस ट्री सजाने के साथ साथ आज इस पर्व की पहचान बन चुका है सांता क्लॉज। सांता क्लॉज की छवि एक गोल मटोल आदमी की है जो हमेशा लाल कपड़े पहन कर रखता है और बच्चों को क्रिसमस पर गिफ्ट देने अपनी स्लेज पर बैठकर आता है। आज सांता क्लॉज के बिना क्रिसमस की कल्पना हर किसी के लिए अधूरी है। सांता क्लॉज को लेकर कई कथाएं हैं। कई लोग मानते हैं कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस,जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही असली सांता थे। संत निकोलस गरीबों को हमेशा गिफ्ट देते थे। उस समय लोग संत निकोलस का काफी आदर करते थे। उसी समय से सांता क्लॉज की परिकल्पना की जाने लगी। कैसे हुई क्रिसमस ट्री की शुरुआत क्रिसमस ईसाइयों का पवित्र पर्व है जिसे वह बड़ा दिन भी कहते हैं। प्रतिवर्ष 25 दिसंबर को प्रभु ईसा मसीह के जन्मदिन के रूप में संपूर्ण विश्व में ईसाई समुदाय के लोग विभिन्न स्थानों पर अपनी-अपनी परंपराओं एवं रीति-रिवाजों के साथ श्रद्धा, भक्ति एवं निष्ठा के साथ मनाते हैं। चर्चों में क्रिसमस डे के उपलक्ष्य में बिजली की लड़ियों से परिसरों को सजाया गया है। क्रिसमस के मौके पर क्रिसमस वृक्ष का विशेष महत्व है। सदाबहार क्रिसमस वृक्ष डगलस, बालसम या फर का पौधा होता है जिस पर क्रिसमस के दिन बहुत सजावट की जाती है। अनुमानतः इस प्रथा की शुरुआत प्राचीन काल में मिस्रवासियों, चीनियों या हिबू्र लोगों ने की थी। यूरोप वासी भी सदाबहार पेड़ों से घरों को सजाते थे। ये लोग इस सदाबहार पेड़ की मालाओं, पुष्पहारों को जीवन की निरंतरता का प्रतीक मानते थे। उनका विश्वास था कि इन पौधों को घरों में सजाने से बुरी आत्माएं दूर रहती हैं। आधुनिक क्रिसमस ट्री की शुरुआत पश्चिम जर्मनी में हुई। मध्यकाल में एक लोकप्रिय नाटक के मंचन के दौरान ईडन गार्डन को दिखाने के लिए फर के पौधों का प्रयोग किया गया जिस पर सेब लटकाए गए। इस पेड़ को स्वर्ग वृक्ष का प्रतीक दिखाया गया था। उसके बाद जर्मनी के लोगों ने 24 दिसंबर को फर के पेड़ से अपने घर की सजावट करनी शुरू कर दी। इस पर रंगीन पत्रियों, कागजों और लकड़ी के तिकोने तख्ते सजाए जाते थे। विक्टोरिया काल में इन पेड़ों पर मोमबत्तियों, टॉफियों और बढ़िया किस्म के केकों को रिबन और कागज की पट्टियों से पेड़ पर बांधा जाता था। इंग्लैंड में प्रिंस अलबर्ट ने 1841 ई. में विडसर कैसल में पहला क्रिसमड ट्री लगाया था।

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