अमरनाथ यात्रा पर हुए हमलें पर अशोक सपड़ा की दिल्ली से यह कविता : पढ़े पूरी

अमरनाथ यात्रा पर हुए हमलें पर अशोक सपड़ा की दिल्ली से यह कविता : पढ़े पूरीअमरनाथ यात्रा पर हुए हमलें पर अशोक सपड़ा की दिल्ली से यह कविता : पढ़े पूरी

बड़ा शातिराना दांव चला आंतकियों ने हथियारो से
क़त्ल कर डाले कई मासूम जुगनू शैतानों ने वारों से
बम बम भोले के कौतुहाल अल्लाह हु अकबर हुआ
हमकों तो आँच भी नहीं आई पर सुलगते हुए नारों से
एक अनसुलझा प्रश्न है बचपन से मेरे भी मन मे यारों
दिल्ली निंदा करके क्यों मौन हो जाती दिन हज़ारों से
कब जूं रेंगेगी कान पर हमारे भारतवासी कहलाने की
जाट चमार राजपूत बाल्मीकि बनें हुए हम पहरेदारों से
कब पाक की छाती पर जाकर उसका भूगोल बिगाड़ेंगे
पूछ रहा हूँ आज संसद में बैठे हुए अपने नाकाम यारों से
कब तक खण्ड खण्ड होगी भारत को अखंडता ऐसे ही
क्या सिमट कर रह गए आसमाँ से हम कुछ चन्द तारों से
दर्द ए हिन्द तुम क्या समझोगे मांफी के तुम काबिल नहीं
बाज़ नहीं आओगे तुम तो हो दो कौड़ी में बिके ग़द्दारों से
सियासित सुराही में और कितना लहू पियोगे बतला दो
पूछ रहा है कवि अशोक अंधी गूंगी सन्सद की दीवारों से
उस दिन होगी सच्ची श्रद्धांजलि अमरनाथ के यात्रियों को
की कोहराम की ख़बरें होंगी पाक में मस्जिद की मीनारों से

अशोक सपड़ा की कलम से........

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