जी हाँ पहचानों मैं तो गधा हूँ : पढ़े पूरी कविता

जी हाँ पहचानों मैं तो गधा हूँ : पढ़े पूरी कविताजी हाँ पहचानों मैं तो गधा हूँ : पढ़े पूरी कविता

जी हाँ पहचानों मैं तो गधा हूँ
अपनी बीबी के लिए सदा हूँ

जितना मेरा होता अपमान
उतना ही मैं पाता हूँ सम्मान

मैं नहीं मांगता कोई ईनाम
नहीं पीता महफ़िल में जाम

मधुर जीवन यह है पाया
दुनियां ने मुझे अपनाया

काम करता भूखा नहीं मरता
कभी घोड़ो से जलन नहीं करता

तकलीफों को हंसकर हूँ जीता
फटेहाल में रहकर जख्म सीता

स्वतन्त्र ख़्वाब मेरे मुझे लुभाते


सब मुझे गदहा गधा ही बताते

गधा होकर मूर्खो का हूँ सरदार
राहत पाने के लिए नहीं बीमार

जंगल में मेरा होता है मंगल
मैं नहीं करता कभी दंगल

बड़ी प्यारी नेक सलाह बताता हूँ
झट से मरघट तुमको ले जाता हूँ

भरोसे लायक नहीं कोई मुझसा
तुम्हारा साथी गधा कहलाता हूँ

अशोक सपड़ा की कलम से..........

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