आज मेरा मोबाइल मेरी इतनी औकात खा गया : पढ़े पूरी कविता

आज मेरा मोबाइल मेरी इतनी औकात खा गया : पढ़े पूरी कविताआज मेरा मोबाइल मेरी इतनी औकात खा गया : पढ़े पूरी कविता

आज मेरा मोबाइल मेरी इतनी औकात खा गया
घर वालों के संग मेरे रिश्तें और जज्बात खा गया

कभी दोस्तों संग महफ़िल में शोरगुल मचाता था
आज ग़मों और खुशियों से भरें हालात खा गया

बरबादियों पर रो नहीं सकता अब मैं रात भर भी
कमबख्त मारा ये मेरी हंसी वो काली रात खा गया

लगता की दुनियां की साजिश का शिकार हुआ मैं
बचपन खोया और मेरी जवानी की ये बात खा गया

मेरे अरमान जलकर राख हो गए इस हादसें में यारों
कीमत चूका के बुझा देता पर ये मेरी बरसात खा गया

माँ बाप भाई बहन सब छूटे फेसबुकिया दुनियां में मेरे
रूठ गई मेरी चाहत मेरे सपनें ये मेरे ख्यालात खा गया

मैं गुमनाम अंधेरो में शोक बनाता रहा कई दिन तक
अशोक करता अपने आप से पर ये सवालात खा गया

पथरीली राहों पे चला हूँ फोन के सहारें रिश्तें निभाने मैं
मुद्दतो के रिश्तें ताक पर रखकर मेरी मुलाकात खा गया

इंटरनेट की दुनियां ने बड़ा मुगालता दिया इस कदर की
इंसानियत मार डाली इसने और आदमी की जात खा गया

अशोक सपड़ा की कलम से दिल्ली से..........

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