कभी सूरत बदलती नहीं है सियासतदानों में : पढ़े पूरी कविता

कभी सूरत बदलती नहीं है सियासतदानों में : पढ़े पूरी कविताकभी सूरत बदलती नहीं है सियासतदानों में : पढ़े पूरी कविता

कभी सूरत बदलती नहीं है सियासतदानों में
शेर घिरने लगे है अब गीदड़ो से बियाबानों में

शेरों का सर काट ले जाते कुछ चन्द चूहे भी
दम नहीं दिखता हमको सन्सद के भगवानो में

बेबसी को आंधी कर रही सबको क्यों बेजुबाँ
अपने इम्तिहाँ क्यों ले रहें अपने ही जवानों में

ख़ाक हो गए जज्बात आग लगी चारों तरफ
अश्क़ों की बरसात नहीं ऊँचें बन्द मकानो में

नकाब पोश कह रहे थे ईट से ईट बजा देंगे
पर्दो के पीछे की आग लगे सिर्फ अफसानों में

कलम तुझे जनुने ए शौक क्या आग उगलने का
समन्दर के हिलोरें भी आएंगे आग के निशानों में

मैं चुप रहता पर आँखों में आग दहकती रहती है
अशोक तू आग लगा देना राजनितिक दुकानों में

कोई आस मत रखना मेरे फौजी भाइयो तुम ज़रा
बेरहम दस्तूर है सन्सद का देश के निगाहेंबानो में

अशोक सपड़ा की कलम से...........

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