कविता अशोक सपड़ा की

2017-10-01 07:30:49.0

कविता अशोक सपड़ा की

जला डालों गर जगदम्बा सीता की इज्जत को किया तार तार वरना बताओं राम क्यों हर बार मेरी इज्जत पे किया तुमनें वारक्यों अब चित्रपट पर दुशासनो को कोई भी नहीं जलाता हैमेरा उद्देलित मन पूछता,क्यों उल्टे मेरे लिए है सबके विचारमेरे दस के दस चेहरे दुनियां के सामने ही रख दिये थे मैंनेनहीं पराई स्त्री को देख कभी ललचाई वासना भरी थी लांरफ़िर क्यों सीता हरण की पीर युगों युगों से मैं सहता आय हूँजब प्रभु श्रीराम ने ही स्वयं दिखलाया मुझको मोक्ष का द्वारबतलाओ क्यों नहीं दहेज के दानव को तुम हर बार जलाते हो मुझे जलाते हो तब मैने बहना की इज्जत पे वारा सारा परिवारदो चार पैग लगाकर जो बड़े आदर्शवादी बनते है आकर केउनसे पूछ रहा कितने राम तुम में हो जो मुझे जलाते हो यारपत्नी हो या बहन की सहेली तुम तो सैक्स ही ढूंढते हो सदा पत्नी आने पर परिवार में ही कर देते हो तुम तो हमार तुम्हारकभी गर्भ में ही मार देते हो नन्ही चिड़ियों को क्यों तुम भीकभी दरिंदगी की हद में जाकर चैक करते हो उनका कौमारहाँ मैं रावण ही ठहरा जला डालों आज अपने हाथों से तुमराम राज्य में सीता असुरक्षित देख बह गई है अश्कों की धारमन कुंठित है आज मेरा की क्योँ मैं रावण बन पैदा हुआ थामैं तो सदियों तक जलूँगा ये सोच दुशासन नहीं बन्द कारागारसब जानते मुझकों की मैं रावण हूँ यही है प्रमाण पत्र मेराखुले घूमते दुरयोधन व दुशासन तो मुझे है धिक्कार धिक्कारअशोक सपड़ा की क़लम से

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